Wednesday, July 20, 2016

करिश्मा ...!!!


हमेशा वो नहीं मिलता जिसे तू माँग आता है ..
ख़ुदा का ही करिश्मा है यहाँ तू जो भी पाता है ;
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अकड़ के मत चलो धरती पे दिन यूँ भी बदलते हैं....
हुआ करता था जो राजा वो अब दर-दर पे जाता है ;
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बड़े ऊंचे महल थे जो मिले है धूल में पल में...
ये दर्पण वक़्त का भी अक्स कब कैसा बनाता है ;
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बिछाये लाख कांटे वो हमेशा फूल खिलते हैं...
मेरे किरदार से मेरा उदू भी ख़ौफ़ खाता है ;
(उदू-दुश्मन)
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गिरे सब ज़र्द पत्ते पर शज़र फिर से हरा होगा ..
पुराना जाएगा मौसम नया तब ही तो आता है ;
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बुरा हो जब समय 'तरुणा' ज़रा सा सब्र तो रख लो....
यही पहचान तो अपने परायों की कराता है ..!!
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...........................................................'तरुणा'...!!!



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